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“नजरें मिलने को तैयार थी

पर हम मिला नहीं पा रहे थे
कदम मिलने को तैयार थे
पर हम मिला नहीं पा रहे थे”
मैं अपने काम में व्यस्त थी और वो अपने काम में व्यस्त था| दोनों को कोई मतलब नहीं था एक दूसरे से| मैं बहुत बार मन ही मन गुजारिश करती थी कि वह मेरी तरफ एक बार बस एक बार देख ले पर देखता ही नहीं था| लेकिन कुछ था जो मेरी नजरों को उसी तरफ देखने को मजबूर करता था| मैं जब भी उसकी तरफ देखती तो उसकी नजरें कभी किताब की तरह तो कभी कंप्यूटर की तरफ होती थी| “गाड़ियों का शौक रखने वाला यह बंदा कहां है जॉब में आ गया” मैं यही सोचती रहती थी| जब भी कोई बात करता था तो उसकी तरफ जरूर देखता था, पर जब मै बात करती थी तू मेरी तरफ नहीं देखता था| मैं समय निकालकर उससे बात करने जाती थी तो थोड़ी देर ही सही पर बात करने के बाद अच्छा लगता था| जब बात नहीं होती थी तो मेरे मन में एक सवाल आता था “कभी बात हुई थी हमारी?” पर इसका जवाब मुझे नहीं मिल पाता था| वक्त का सफर हमारे बीच कितना लंबा था और कितना लंबा होना था मुझे पता नहीं था| बस एक हद तक उसका इंतजार किया और फिर उस इंतजार का भी इंतजार छोड़ दिया|
तारीख याद नहीं मुझको कि कब हमारी पहली बार बात हुई थी पर इतना जरूर मालूम है कि क्या बात हुई थी| “मुझे घर जाना है, आपकी अनुमति चाहिए|” मेरी तरफ देख कर मुझसे पूछने लगा “क्यों जाना है? क्या हुआ है? उसके सवाल पूछने पर मुझे ऐसा लगा कि वह कुछ और बताना चाह रहा था पर शायद मेरा वहम था| उसको मैंने घर जाने का कारण बताया “मैं पढ़ाती हूं ना तो इसलिए मुझे घर जाना है”, मुझे अनुमति तो मिल गई थी पर सवालों की कड़ियां भी खड़ी हो गई थी| “क्या पढ़ाती हो? किस क्लास को पढ़ाती हो? कितना लेती हो? सवाल सुनकर थोड़ा कंफ्यूज हो गई थी कि बोलूं तो बोलूं क्या? एक तो सवाल क्या था दूसरे सवाल पूछने वाला कौन था, जिसके सामने आसानी से बोल नहीं पाती थी| फिर भी पूरी कोशिश के साथ मैंने उन सवालों का जवाब दिया और वहां से जाने लगी| पर फिर मुझसे मेरा नंबर मांगा गया| मेरा मन मुझसे पूछने लगा कि “सुबह-सुबह आज कुछ हुआ था क्या तुम्हारे साथ जो आज तुम्हारे मन का हो रहा है? खुशी तो बहुत हो रही थी पर जाहिर नहीं कर पा रही थी| हमारे नंबरों की अदला बदली हो गई थी और मैं तो मानो मन ही मन पागल हो रही थी| कुछ दिन बाद मेरे पास एक अनजान नंबर से मेरी तस्वीर के लिए संदेश आता है| चेक करने पर उसी का नंबर निकलता है| एक दोस्त के नाते मैंने उसको रिप्लाई भी किया पर मेरी हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी| क्योंकि मैं बहुत खुश थी| धीरे-धीरे हमारी बातों का सिलसिला बढ़ता गया और वह कब मन के खेल में तब्दील हुआ पता ही नहीं चला| सुबह से शाम तक भले ही कम बात होती थी लेकिन वह भी बहुत सुकून दिला जाती थीी| भले ही हम अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते थे पर शायद एक दूसरे के बारे में सोचते थे| एक दिन, मौसम बहुत खराब था, बारिश होने वाली थी मुझसे बोला गया कि मैं घर चली जाऊं| सुनकर अच्छा तो नहीं लगा था पर दोस्तों के साथ घर चली गई| मैंने घर जाकर उससे सवाल पूछा कि “आज आपने अचानक से घर जाने को क्यों बोला?” उसका जवाब सुन हैरान हो गई थी और थोड़ी कंफ्यूज भी हो गई थी इसमें हंसू या रोउं| उसने जवाब दिया कि “मौसम बहुत ज्यादा खराब था, बारिश में भीग जाती तो बीमार पड़ जाती|” शायद वह फिक्र थी पर मैं समझ नहीं पा रही थी|
“लबों पर लिखी बातों का वक्त पर इजहार करो दिल में कुछ हो तो खुलकर बात करो”
वक्त कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता| हमारे बीच उम्र का फासला तो था पर नजर नहीं आता था| पता नहीं क्यों पर हमारी बातों का दायरा कम होने लगा| वह अपने काम में पूरी तरह लीन हो गया था और मैं अपने काम| फिर भी मुझे उसका कुछ वक्त चाहिए जो वो नहीं समझ पा रहा था| हमारी बातों का सिलसिला बहुत जल्दी खत्म हो गया था| मुझे अच्छा नहीं लगता था लेकिन इस मन को भी हटाना था| इसके लिए मैंने अपने आप को केवल पंद्रह मिनट दिए और जो मुझे समझ आया शायद आप लोगों को भी समझ में आ गया होगा|
“किसी को उतना ही वक्त दो
जितना उसको चाहिए
ज्यादा जिद करोगे तो दर्द खुद को होगा सामने वाले का कुछ नहीं बिगड़ेगा”
किसी को देख मन का पागल होना, विचारों का अचानक से आ जाना “उससे बात हो जाए, एक बार बात हो जाए कितना, स्मार्ट है यार” मन का खेल होता है| आज भी हमारी बात होती है ख़ुशी भी उतनी ही मिलती है| पर उस खुशी को काबू में रखती हूं क्योंकि मन का तो खेल है मन से खेलना|

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